राष्ट्रीय आदिवासी इंडिजिनस धर्म समन्वय समिति छत्तीसगढ़ के तत्वाधान में ट्राइबल/आदिवासी धर्म कॉलम के लिए गोंडवाना भवन रायपुर में प्रदेश स्तरीय सेमीनार हुआ सम्पन्न

 राष्ट्रीय आदिवासी इंडिजिनस धर्म समन्वय समिति छत्तीसगढ़ के तत्वाधान में ट्राइबल/आदिवासी धर्म कॉलम के लिए गोंडवाना भवन रायपुर में प्रदेश स्तरीय सेमीनार हुआ सम्पन्न

रायपुर// दिन शनिवार को राष्ट्रीय आदिवासी इंडिजीनस धर्म समन्वय समिति छत्तीसगढ़, सर्व आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ के तत्वाधान में आदिवासियों के लिए 2021 के जनगणना प्रपत्र में ट्राइबल/आदिवासी धर्म कॉलम को शामिल करने एवं प्रचार प्रसार के लिए गोंडवाना भवन टिकरा पारा रायपुर में सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसमें छत्तीसगढ़ प्रदेश के आदिवासी सर्व समाज का समर्थन प्राप्त हुआ। संविधान आदिवासियों/ जनजातियों के लिए निश्चित आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा का निर्धारण करता है। सामाजिक सुरक्षा से संबंधित बातें संविधान के अनुच्छेद 14,15(ख),16(4)(ए) और 399(1) में निहित है।
माननीय उच्चतम न्यायालय का फैसला कैलाश बनाम महाराष्ट्र सरकार 5/1/2011 के अनुसार आदिवासी इस देश का मूल मालिक है परंतु आज की परिस्थिति में आदिवासियों को जनगणना प्रपत्र में अलग से धर्म कॉलम नहीं देना प्राकृतिक न्याय के विरूद्ध है। भारतीय सविधान के अनुछेद 13(3)(क) इसमें आदिवासियों की स्वशासन व्यवस्थाओं तथा रूढ़ि व प्रथा (Customary law) को विधि का बल प्राप्त है जिसके कारण आदिवासी समाज अपनी पहचान अपनी परंपरा अपनी संस्कृति को बचाए रखा है हम आदिवासी/ जनजाति समुदाय के लोग भारत की जनगणना रिपोर्ट सन 2011 के अनुसार लगभग 12 करोड हैं जो कि देश की कुल आबादी के 9.92 प्रतिशत है इसके बावजूद हमको धर्म कॉलम आबंटित नहीं है । भारत में रहने वाले समस्त आदिवासियों / जनजातियों की विशिष्ट रुढ़िवादी नेंग मिजान परंपरा रीति- रिवाज पूजा पद्धति भाषा बोली कस्टमरी क़ानून है जो बिलकुल अलग है। भारत में जनगणना पद्धति 1871 से प्रारंभ हुआ है तब से लेकर 1951तक कहने का तात्पर्य स्वतंत्रता के पूर्व व स्वतंत्रता के पश्चात भी आदिवासियों /जनजातियों का धर्म कॉलम की व्यवस्था संविधान में थी जिसे स्वतंत्र भारत वर्ष में 1951 की जनगणना प्रपत्र से एक साजिश के तहत हटा दिया गया। स्वतंत्र भारत का संविधान भारत में निवास करने वाले प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है परंतु भारत में रहने वाले आदिवासियों/ जनजातियों का कोई भी निश्चित धर्म कॉलम नहीं है जो संविधान प्रदत्त अधिकार औचित्य एवं अनुकूल नहीं है। भारत की जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग धर्म कॉलम के अभाव में समस्त आदिवासी /जनजाति समुदाय, सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में बिखरा बिखरा या असंगठित नजर आता है। ज्ञात हो कि 2011 की जनगणना प्रपत्र में भारत के विभिन्न राज्यों की आदिवासी जनजाति समुदाय के द्वारा कुल 83 प्रकार की विभिन्न नामों से अपने धर्म का नाम जनगणना प्रपत्र की कॉलम में दर्ज कराया था तथा सभी आदिवासी जनजाति समुदाय अपने लिए अलग धर्म कॉलम की मांग कर रहे हैं । जिसके कारण भारत के गृह मंत्रालय एवं भारत के महा रजिस्टार कार्यालय को कहना पड़ा कि देश के विभिन्न आदिवासी जनजाति समुदाय को अलग अलग नामों से धर्म कोड कॉलम देना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है और इस तरह की मांग स्वीकार्य नहीं है।।
इसी कारण आदिवासी समुदाय द्वारा विगत चार वर्षों से देश के विभिन्न राज्यों में सेमिनार आयोजित कर जनजागृति लाया गया है तथा भारत के समस्त आदिवासी समाज प्रमुखों द्वारा 24 व 25 अगस्त 2019 को अंडमान के पोर्ट ब्लेयर शहर में छोटा नागपुर भवन पर राष्ट्रीय स्तर पर दो दिवसीय सेमिनार आयोजित किया गया। जिसमें लगभग 20 राज्यों के आदिवासी समाज के प्रमुख लोग उपस्थित थे जिसमें सर्वसम्मति से 2021 में होने वाली जनगणना प्रपत्र की धर्म कॉलम में ट्राइबल शब्द लिखे जाने हेतु सम्मति बनी जो 1931 के जनगणना में आदिवासियों के लिए जनगणना कॉलम पृथक रूप से शामिल किया गया था जिस प्रकार इंडिया दैट इज भारत ठीक उसी प्रकार ट्राइबल दैट इज आदिवासी अतः 2021की जनगणना प्रपत्र में आदिवासियों के लिए धर्म कॉलम में ट्राइबल शब्द/ आदिवासी शब्द अंकित करें और आदिवासी समाज लिखें और प्रचार प्रसार करें ताकि आदिवासी समाज अपनी मूल परंपरा संस्कृति रीति-रिवाज की अस्तित्व को न खोए तथा उनको प्राकृतिक रूप से न्याय मिल सके।

rj ramjhajhar

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